नारीवाद नहीं नारी विमर्श की आवश्यक्ता है..

वर्तमान समाज के निर्माण में महिलाओं के योगदान को महत्व दिए बिना विकास की ओर नहीं बढ़ा जा सकता है।  नारी विमर्श के बारे में सुना होगा , मगर यह है क्या? इसके बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम है। इसे जाने बिना इस पर बहस करना बेईमानी जैसा है।नारी विमर्श एक ऐसा आइना है जो समाज में नारी की स्तिथि के कारणों का पता लगाता है और उसके राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करता है। नारी विमर्श ही समाज में नारी सशक्तिकरण का विश्लेषण कर सकता है। एक सफल नारी सशक्तिकरण के लिए कौन-कौन सी रणनीति अपनाई जा सकती है यह नारी विमर्श पर ही निर्भर करता है। पुरुषों के मुकाबले महिलाएं किसी भी कार्य में उनसे कम नहीं है इसके बाद भी उन्हें अवसरों से वंचित रखा जाता है।

नारी विमर्श पुरुषों से आगे निकलने की होड़ नहीं बल्कि समानता की जंग है। समानता हर उस कार्य को करने की जो वह पुरुषों के जैसा या उनसे बेहतर कर सकती है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो राजनीति हो या खेलकूद का मैदान जहाँ एक ओर इंदिरा गांधी ने राजनीति में अपना सिक्का मनवाया तो कल्पना चावला ने आतंरिक में अपना परचम लहराया। जहाँ खेलकूद में पी. टी उषा भारत की सबसे अच्छी खिलाड़ियों में से एक बनी तो वही गीता फोगाट ने भारत के लिए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जिताया था।

नारी विमर्श का अर्थ पुरुषों से आगे निकलना नहीं बल्कि उनके साथ कदम से कदम मिला कर चलना है। जहाँ तक अधिकारों और कर्तव्यों की बात तो यह आवश्यक है की दोनों में समानता होनी चाहिए किन्तु कार्यों के मद्देनज़र दोनों सामान नहीं हो सकती क्योंकि शारीरिक बनावट से लेकर उनके प्राकृतिक दायित्व अलग अलग है। इस लिए विमर्श ‘समान स्तर’ को लेकर होना चाहिए, न की एक दूसरे के विकल्प के तौर पर स्थापित करने का प्रयास..

रिपोर्ट – निहारिका चतुर्वेदी

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