गुजरात, बिहार और इन राज्यों ने मोदी सरकार की फसल बीमा योजना से किया तौबा, जानिए क्यों हुआ ऐसा?

कृषि मंत्रालय प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PM fasal bima yojana) की तारीफों के पुल बांधने में जुटा हुआ है, लेकिन कई राज्यों को इसमें खामी नजर आ रही है. जिसकी वजह से उन्होंने इस स्कीम से तौबा कर लिया है. हैरानी की बात यह है कि इसमें बीजेपी शासित गुजरात और एनडीए के शासन वाला बिहार भी शामिल है. सवाल यह है कि अगर राज्यों ने इस स्कीम से बाहर निकलने का विकल्प चुना है तो इसकी वजह क्या है? क्या इसलिए कि उनके किसानों को फसल नुकसान (Crop loss) के बावजूद आसानी से क्लेम नहीं मिल पा रहा या फिर इसके पीछे भारी भरकम प्रीमियम का मुद्दा है.

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि देश में खरीफ-2016 मौसम से शुरू की गई पीएम फसल बीमा योजना (PMFBY) राज्यों के लिए स्वैच्छिक है. कोई भी राज्य अपनी जोखिम धारणा और वित्तीय विचारों को ध्यान में रखते हुए योजना के पक्ष में या इसके पक्ष में नहीं का विकल्प चुन सकता है. आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल ने कुछ मौसम में इसे कार्यान्वित करने के बाद बंद कर दिया है. इसके बदले वो अपनी बीमा योजनाओं या मुआवजा स्कीम को कार्यान्वित कर रहे हैं. हालांकि, ये योजनाएं केंद्र की तुलना में किसानों (Farmers) को सीमित लाभ प्रदान कर रही हैं.

क्यों बाहर हो रहे राज्य?

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक राज्यों को लग रहा है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम (Insurance Premium) का पैसा बहुत अधिक ले रही हैं. जबकि किसानों को पूरा क्लेम नहीं दे रहीं. ऐसे में राज्य का न सिर्फ आर्थिक नुकसान हो रहा है बल्कि जब किसानों को क्लेम लेने में दिक्कत होती है तो वो उसका ठीकरा सरकार पर फोड़ते हैं. इसका सियासी नुकसान होने की संभावना बढ़ रही है. किसी राज्य में शासन कर रही पार्टी पैसा खर्च करने के बाद भी सियासी जोखिम क्यों उठाना चाहेगी. बीजेपी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान खुद बीमा कंपनियों की मनमानी पर सार्वजनिक तौर पर बोल चुके हैं.

राज्यों की अपनी बीमा स्कीम

राज्य योजना
आंध्र प्रदेश डॉ. वाईएसआर मुफ्त फसल बीमा योजना
बिहार बिहार राज्य फसल सहायता योजना
गुजरात मुख्यमंत्री सहाय योजना
झारखंड झारखंड फसल राहत योजना*
पश्चिम बंगाल बांग्ला शश्य बीमा
  *राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित है, लेकिन ऑपरेशनल नहीं है.

पीएम फसल योजना का फायदा

-काश्तकार और बटाईदार सहित सभी किसान इस योजना का लाभ उठा सकते हैं.
-खरीफ सीजन 2020 से यह योजना सभी किसानों के लिए भी स्वैच्छिक है.
-यानी वे इस योजना के पक्ष में हां या ना का विकल्प चुन सकते हैं.
-अब तक इस योजना में किसानों ने 21,574 करोड़ रुपये का प्रीमियम दिया है.
-इसके बदले 843.4 लाख किसानों को 98,108 करोड़ रुपये मिले हैं.

पीएम फसल योजना का नुकसान

-बीमा कंपनियों की मनमानी की वजह से हजारों किसान क्लेम के लिए भटक रहे हैं.
-साल 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में 2288.6 करोड़ रुपये के क्लेम पेंडिंग हैं.
-यह 9 जुलाई 2021 तक का रिकॉर्ड है.
-राज्यों को लगता है कि फसल बीमा में उनके हिस्से का प्रीमियम बहुत ज्यादा है.
-बीमा का प्रीमियम कंपनियां लेती हैं जबकि फसल खराब होने की रिपोर्ट राजस्व विभाग बनाता है.

कहां के किसानों का कितना क्लेम बाकी

-2018-19: झारखंड के किसानों (farmers) का 663.8 करोड़ रुपये.
-तेलंगाना के लोगों का 438.4 करोड़ रुपये का क्लेम बाकी है.
-कर्नाटक के किसानों का 59.4 करोड़ रुपये का क्लेम अब तक नहीं मिला है.
-2019-20: तेलंगाना के किसानों का सबसे अधिक 402.3 करोड़ रुपये का क्लेम बाकी है.
-गुजरात के अन्नदाताओं का 243.2 करोड़ रुपये का क्लेम नहीं मिला है.
-कर्नाटक के 149 और मध्य प्रदेश के किसानों का 95.5 करोड़ रुपये का क्लेम बाकी है.
-उत्तर प्रदेश के किसानों का 24 करोड़ रुपये का क्लेम नहीं मिला है.

क्यों रुकता है बीमा क्लेम

-राज्यों की ओर से उपज डेटा देने में देरी.
-प्रीमियम सब्सिडी में राज्य का शेयर जारी करने में देरी.
-बीमा कंपनियों और राज्यों के बीच उपज संबंधी विवाद.
-पात्र किसानों के बैंक खाते का विवरण प्राप्त न होना और एनईएफटी से संबंधित मुद्दे.
-देश के 19 राज्यों ने अब तक 1894.07 करोड़ रुपये की फसल बीमा प्रीमियम सब्सिडी का अपना शेयर नहीं दिया है.

फसल बीमा के प्रीमियम पर नेताओं ने क्या कहा?

तमिलनाडु के डीएमके सांसद षणमुग सुंदरम और पी. वेलुसामी ने 20 जुलाई 2021 को लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में पूछा था कि क्या कृषि मंत्रालय ने यह नोटिस किया है कि कई राज्यों को फसल बीमा के अपने हिस्से का भुगतान करना कठिन महसूस हो रहा है. वे भुगतान नहीं कर पा रहे. कई बार राज्यों के हिस्से का प्रीमियम उनके कृषि बजट का 50 फीसदी होता है.

साल 2020 में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता और आंध्र प्रदेश के सांसद वी. विजय साई रेड्डी ने केंद्र सरकार से राज्यसभा में पूछा था कि राज्यों के हालात को देखते हुए क्या कृषि मंत्रालय प्रीमियम की पूरी धनराशि के भुगतान का दायित्य उठाने पर विचार कर रहा है? क्योंकि कभी-कभी फसल बीमा योजना में राज्यों का हिस्सा उनके पूरे कृषि बजट का 50 फीसदी होता है.

चौहान ने क्या कहा था?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साल 2020 में किसानों के एक कार्यक्रम में कहा था, “बीमा कंपनी खेल खेलती रहती है. खुद सोचिए कि क्या कोई कंपनी घाटे में बीमा करेगी? अगर वो प्रीमियम लेंगे 4000 करोड़ तो देंगे 3000 करोड़. इसलिए अब हम खुद मुआवजा देंगे. दो लेगेंगे तो दो और 10 लगेंगे तो 10 देंगे. काहे की कंपनी. आधी रकम नुकसान पर तुरंत दे देंगे और आधी नुकसान का आकलन करने के बाद.” हालांकि, मध्य प्रदेश अभी इस स्कीम से बाहर नहीं हुआ है.

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