जैविक खेती से सुधरेगी कृषि उत्पादन

संतकबीर नगर –  भारत सरकार खेती को समृद्ध करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। जैविक खेती के दायरे में खाने-पीने की वे चीजें आती हैं जिन्हें सिंथेटिक फर्टिलाइजर (कृत्रिम खाद), कृृत्रिम कीटनाशक (सिंथेटिक पेस्टीसाइड) या कृत्रिम हाॅर्मोन (सिंथेटिक हार्मोन) की मदद के बगैर तैयार किया जाता है। ये कुदरती तरीके से तैयार चीजें होती हैं जो सेहत के लिहाज से काफी उपयोगी हैं।

जैविक खेती से देशवासियों की सेहत भी सुधारी जा रही है और भरपूर मुनाफा भी कमाया जा सकता है। इस हिसाब से किसानों को जैविक खेती के प्रति जागरुक किया जा रहा है। रासायनिक खाद के लगातार प्रयोग से एक तरफ मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है तो दूसरी तरफ किसानों को काफी पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर, गोरखपुर, महाराजगंज, जौनपुर, सुल्तानपुर, फैजाबाद, मेरठ, बागपत, फरुर्खाबाद सहित विभिन्न जिलों में जैविक खेती को लेकर किसानों में प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है उत्तर प्रदेश में कृषि विभाग के साथ ही कुछ निजी कम्पनियों की ओर से भी जैविक खेती के प्रति किसानों को जागरुक किया जा रहा है। किसानों में जैविक खेती के प्रति ललक पैदा हो रही है। कृषि विज्ञान केन्द्र एवं केन्द्र पोषित संस्था ‘आत्मा’ की ओर से भी जैविक खेती कराई जा रही है।

संतकबीरनगर निवासी किसान शिवनाथ ग्राम्य संदेश से बात करते हुए बताते हैं कि जैविक खाद से खेत और जानवरों पर बहुत ही उम्दा प्रभाव पड़ता है, पर अब गोबर की खाद ना मिलने की वजह से रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करना पड़ता है जो हेल्थ और जानवरों के सेहत के लिए भी सही नहीं है। एक तरह से हम जहर का ही सेवन अप्रत्यक्ष रुप से कर रहे हैं।

किसान शुभकरन कहते हैं कि खेती अब तो हम लोग रासायनिक उर्वरकों के साथ ही करते हैं। घर पर कोई जानवर नहीं है इसलिए गोबर की खाद नहीं मिल पाती है। कुछ लोग तो गोबर की खाद खरीद कर लाते हैं. कीटनाशक दवाओं और यूरिया व डीएपी से तो स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है पर अब खेती बिना उर्वरक के प्रयोग से संभव ही नहीं है।

सरायकेला कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार मिश्रा का कहना है कि अधिक पैदावार के लिए रासायनिक खाद व कीटनाशक का सीमित उपयोग किया जा सकता है। बेतहाशा इस्तेमाल के कारण इसका दुष्प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है। इससे मानव के साथ पशु-पक्षियों को भी नुकसान पहुंच रहा है। मिट्टी की दशा भी बदल रही है।

फल और सब्जी उत्पादन बढ़ाने के लिए इन रसायनों का अधिक इस्तेमाल होता है। छिड़काव के बाद निर्धारित समय के पूर्व फल और सब्जी तोड़े जाने के कारण उसे खाने वालों पर रसायनों का प्रभाव पड़ता है। इन खादों के प्रयोग से आंख, पेट व बालों से संबंधित बीमारी के साथ कैंसर होने का खतरा रहता है। एक प्रकार से रासायनिक खाद व कीटनाशक धीमा जहर का काम करता है।

रिपोर्ट – गंगेश्वर यादव

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