किसान भाई रखें खयालः मौसम की मार से फसल न हो लाचार

सर्दी के मौसम में हुई बारिश किसानों की मेहनत पर पानी फेर सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मौसम का यह मिजाज फसलों को कई तरह के रोगों से ग्रसित कर सकता है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने रबी की प्रमुख फसलों को कीटों और रोगों से बचाव करने की सलाह दी है।

जिला कृषि रक्षा अधिकारी विकास शुक्ला के मुताबिक इस मौसम में बारिश के कारण नमी बढ़ जाती है जिससे रबी की प्रमुख फसलों में कीटों और रोगों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में किसान भाईयों को फसलों की नियमित निगरानी करनी चाहिए। कृषि विभाग के मुताबिक किस फसल में कौन सी बीमारी लग सकती है उसके लक्षण क्या हैं और इनसे फसलों को बचाने के लिए क्या उपाय किए जाए इसकी जानकारी निम्नवत है।

राई और सरसों- की फसल में व्हाईट रस्ट नामक बीमारी हो जाती है। इस बीमारी का मुख्य कारक एल्बूगोकेनडिउ नामक फफूंदी के कारण होती है। इस बीमारी से ग्रसित पौधों की पत्तियों में सफेद रंग के फफोले बन जाते है जो पौधों के पुष्प विन्यास को विकृत कर देते हैं।

यदि पौधों में यह लक्षण दिखते हैं तो किसानों को जिनेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी की 2.5 ग्राम या फिर काॅपर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर इस घोल की 200 लीटर मात्रा को प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करायें।

आल्टरनेरिया की बीमारी में पत्तियों पर भूरे रंग के छल्लाकार धब्बे बन जाते हैं। जब यह रोग बढ़ता है तो ये धब्बे छेद में परिवर्तित हो जाते है। इस बीमारी से फसल बचाने के लिए मैन्कोजेब 75 प्रति डब्ल्यू पी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर की पानी में घोलकर इस घोल की 200 लीटर मात्रा को प्रति एकड़ की दर से छिड़काव कराना चाहिए।

आलू- मौसम में नमी, कोहरा और बदली रहने के कारण आलू की फसल में अगेती, पिछेती झुलसा रोग के प्रकोप के लक्षण दिखाई देना प्रारम्भ हो गये है। इस बीमारी का मुख्य कारण आल्टरनेरिया सोलेनाई एवं फाईटोप्थेरा नामक फफूंदी होती है। अगर किसानों को अपनी फसल में पत्तियों और तने पर भूरे काले रंग के अनियमित आकार के धब्बे नजर आए तो किसान तुरंत सचेत हो जाएं। क्योंकि यह स्थिति बढ़ने पर पूरा पौधा झुलस जाता है। इससे बचने के लिए मैन्कोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी -0.8 किलोग्राम, जिनेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी -0.8 किलोग्राम या फिर काॅपर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी -1.0 कि0ग्राम का घोल दो से ढाई सौ लीटर पानी में प्रति एकड़ की दर से छिड़काव कराएं।

गेहूँ- गेहूं की फसल में इस मौसम में पीली गेरूई रोग लगने की संभावना रहती है। इस बीमारी के चलते सबसे पहले पत्तियों पर पीले रंग की धारी की रूप में दिखायी देती है। इन पत्तियों को छूने पर पीले रंग का पाउडर जैसा हाथों पर दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ई सी 200 मिली लीटर मात्रा को 200-250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिडकाव करना चाहिए। यदि रोग का प्रभाव अधिक हो तो एक पखवारे के अंतराल में दूसरा छिड़काव भी करना चाहिए।

यह भी रखें ध्यानः
किसानों को इस बात का भी विशेष खयाल रखना है कि यदि वर्षा और अधिक कोहरा हो तो ऐसी स्थिति में रसायनों का छिड़काव न करें। खुले मौसम में ही ये रसायन अपना पूरा असर दिखाते है।

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