किसानों ने अभिशाप को बनाया वरदान बालू रेत बना सोने की खान

श्रावस्ती। बारिश के मौसम में नदियों का उफान तबाही लेकर आता है। खेत खलिहान सब जलमग्न हो जाते हैं। नदी तट पर रहने वाले किसानों के लिए संकट भरे मार्ग का सामना करना पड़ता है। बाढ़ के इस अभिशाप को कुछ किसानों ने अपने लिए वरदान बना लिया है।
राप्ती नदी के बालू से भरे कछार पर मामूली किराया देकर भूमिहीन किसान खेती की सब्जी कर रहे हैं। अपनी मेहनत व इच्छा शक्ति के दम पर रेत में भी फसलों को लहलहाने वाले किसान सीतापुर, शाहजहांपुर व लखीमपुर के मूल निवासी हैं। इन किसानों की मेहनत और लगन से दूर-दूर फैले रेत के मैदान आज हरे—भरे नजर आ रहे हैं। यहां की सब्जियों की आपूर्ति श्रावस्ती सहित पड़ोसी जिले बलरामपुर, बहराइच, में की जाती है।

राप्ती नदी से घिरा इस जिले के विकासखंड गिलौला के गौहनिया पुरैना, केरवानिया, सेमरा, रामनगरा व विकास खंड इकौना के सिस्वारा, अंधर पुरवा, भमेपारा आदि गांव के 450 बीघा से अधिक के रेतीले भूखंड पर सब्जियां जैसे करेला, कद्दू, लौकी, टमाटर, परवल, खीरा, ककड़ी, तरबूज, मिर्च, भिंडी आदि फसलें लहलहा रही हैं।

बाढ़ के उफान के साथ नदी जो बालू लेकर आयी। वह किसानों के लिये वरदान बन गयी। इस गांव के लगभग 35 परिवार ठेके पर जमीन लेकर सब्जी की खेती कर रहे हैं। इन किसानों का कहना है कि कछार से पैदा की गयी सब्जियां स्थानीय बाजारों व आसपास जिलो में भेजते है।

क्या कहते है किसान

किसान मोहम्द रफीक व मोहम्द सलीम ने बताया कि नदी के कछार में कम लागत से अधिक उत्पादन होता है। रसूल अहमद, छोटेलाल व हनीफ का कहना है की कछार की मिट्टी में न तो अधिक खाद की जरूरत होती है न ही सिंचाई की।

रिपोर्ट
चंद्र प्रकाश शुक्ला

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