इंजीनियर का इनोवेशन प्रदूषण को किया धुआं धुआं, खेत के कचरे से बन रहा ईंधन

वापी,गुजरात – भारत में आज भी न जाने कितने ही गांवों में अनगिनत महिलाएं खाना पकाते हुए इस धुएं को झेलती हैं और सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि घर के बच्चे भी इसका शिकार होते हैं। बहुत बार तो धुएं की वजह से उन्हें खांसी व दमा जैसी बीमारियाँ भी हो जाती हैं। रिपोर्टस के अनुसार, दुनिया में हर साल लगभग 3. 8 मिलियन लोगों की मौत घरों में धुएं आदि के चलते होने वाले वायु-प्रदूषण से होने वाली बिमारियों जैसे न्यूमोनिया, स्ट्रोक, सांस लेने में तकलीफ़ आदि के कारण होती है।

ग्रामीणों की इन्हीं सब समस्याओं को जान-समझकर,गुजरात के एक इंजीनियर, दर्शील पांचाल ने एक ऐसी हाथ से चलने वाली ब्रिकेटिंग मशीन बनाई है, जिससे बहुत ही आसानी से ये ब्रिकेट्स बनाये जा सकते हैं। इस मशीन को न तो बिजली की ज़रूरत है और न ही पेट्रोल-डीजल की। हाथ से चलने वाली यह मशीन बहुत ही कम वजन की है और कम स्थान घेरती है। बायोमास ब्रिकेट, एक किफायती, इको-फ्रेंडली और बहुत ही कारगर ईंधन का विकल्प है। बाज़ारों में ब्रिकेट बनाने की बड़ी-बड़ी मशीनें उपलब्ध हैं लेकिन ये मशीनें इतनी महंगी हैं कि आम ग्रामीण इसे नहीं खरीद सकते हैं। दर्शील पांचाल ने इन्हीं सब सम्सयाओं को देखते हुए बेहद कम बजट में एक बेहद अनोखे बायोमास ब्रिकेट को खुद से ही बना डाला है।

गुजरात के वापी में रहने वाली दर्शील ने अमेरिका से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने अपने फैमिली बिज़नेस, एस. के. इंजीनियर्स में काम करना शुरू किया, जहाँ वे अलग-अलग इंडस्ट्रीस के लिए मशीनरी बनाते हैं।  ग्राम्य संदेश से बात करते हुए दर्शील ने कहा,“ एक सोशल फाउंडेशन के साथ काम के दौरान मुझे पता चला कि कैसे आज भी गांवों में औरतें पारम्परिक ईंधन के चलते बहुत सी बिमारियों का शिकार होती हैं। मैं चाहता था कि उनके लिए ऐसा कोई ईंधन उपलब्ध हो जो कि उनके लिए सस्ता भी हो और अच्छा भी हो। जब मैं इस पर काम कर रहा था तो मुझे बायोमास ब्रिकेट्स के बारे में पता चला।”

 

 

क्या हैं बायोमास ब्रिकेट – कृषि में बचने वाले जैविक कचरे जैसे कि भूसा, पराली, फूस आदि और किचन वेस्ट व गोबर आदि को इस्तेमाल करके ये ब्रिकेट बनाये जाते हैं। यह कोयले का जैविक विकल्प है। एक ब्रिकेट लगभग 15-20 मिनट तक जलता है और यह पुर्णतः पर्यावरण के अनुकूल है। साथ ही, ये बहुत ही हल्के होते हैं और इन्हें स्टोर करना भी बहुत ही आसान है। खेतों में बचने वाले कचरे को अक्सर किसान जला देते हैं, पर यह बहुत ही कारगर साबित हो सकता है, ये उन्हें पता ही नहीं है। बाकी जिसे थोड़ी-बहुत जानकारी है, वह अक्सर यह सोचते हैं कि ब्रिकेट कैसे बनाये जाएँ। दूसरी तरफ, देश में ज़्यादातर बॉयलर प्लांट्स में इन ब्रिकेट्स को इस्तेमाल किया जा रहा है। जिसके लिए व्यवसायी गांवों से बहुत ही कम दामों में जैविक कचरा खरीदते हैं और फिर इलेक्ट्रिक मशीनों से उससे ब्रिकेट्स बनाकर, इंडस्ट्री में इस्तेमाल करते हैं।

बायोमास ब्रिकेट के बारे में बात करते हुए दर्शील ने बताया कि ब्रिकेट बनाने की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। कोई भी इसे आसानी से अपने रोज़मर्रा के काम करते हुए बना सकता है। सबसे पहले सभी तरह के कूड़े-कचरे, एग्री-वेस्ट, किचन वेस्ट, कागज़ आदि को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। फिर इसमें थोड़ा पानी और गोबर मिलाकर स्लरी तैयार की जाती है। जब यह मिश्रण थोड़ा गाढ़ा हो जाता है तो इसे मशीन में डालकर ब्रिकेट का आकार दिया जाता है। आकार देने के बाद ब्रिकेट्स को दो-तीन दिन के लिए सुखा दिया जाता है। इन ब्रिकेट्स को आप घर में ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं और साथ ही, बाज़ार में आप इसे 7 रुपये से 10 रुपये प्रति किग्रा के हिसाब से बेचकर एक अच्छी आमदनी भी कमा सकते हैं।
ग्राम्य संदेश से बात करते हुए दर्शील आगे बताते हैं ब्रिकेट्स बनाने की क्षमता के हिसाब से उन्होंने मैन्युअल ब्रिकेटिंग मशीन के अब तक 3 मॉडल बनाये हैं। यदि दो व्यक्ति प्रतिदिन 8 घंटे इन मशीन पर काम करें तो ब्रिकेटिंग लीवर प्रेस मॉडल से एक घंटे में 20-25 ब्रिकेट्स बना सकते हैं। पूरे दिन में लगभग 40 किलोग्राम ब्रिकेट्स बनाने की इस मशीन की क्षमता है। और इस मशीन की कीमत जीएसटी समेत आपको 16, 000 रुपये पड़ती है। तो वहीं 22, 000 रुपये की कीमत वाली ब्रिकेटिंग जैक मशीन की क्षमता एक दिन में 64 किलोग्राम ब्रिकेट्स और प्रति घंटा 35-40 ब्रिकेट्स बनाने की है। तीसरा मॉडल, ब्रिकेटिंग हाइड्रोलिक जैक है, जिससे आप 90 किलोग्राम ब्रिकेट्स प्रतिदिन और 48-56 ब्रिकेट्स प्रतिघंटा बना सकते हैं। इसकी कीमत 28, 000 रुपये है। दर्शील ने कहा कि ब्रिकेट्स की ज्वलनशीलता लकड़ी के ही समान होती है पर इसमें धुएं जैसा कुछ नहीं होता है।

 

 

दर्शील के मुताबिक उनकी कंपनी अब तक 200 मशीनें बेच चुकी है। उन्होंने मणिपुर, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में मशीनें दी हैं। हालांकि, उन्होंने बताया कि वे सीधे तौर पर ग्रामीण समुदायों को बहुत कम मशीनें दे पाएं हैं। ज़्यादातर, इन ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे संगठनों ने उनसे ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए मशीनें खरीदी हैं। दर्शील ने बताया कि उनकी कंपनी जिन भी संगठनों या फिर स्वयं सहायता समूहों को मशीनें देते हैं, उन्हें जाकर एक बार इसे इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग भी देकर आते हैं। प्रक्रिया बहुत ही आसान है इसलिए दोबारा जाने की आवश्यक्ता बहुत कम ही पड़ती है।

बायोमास ब्रिकेट के बारे में बताते हुए दर्शील बताते हैं कि इसमें सिर्फ 25 प्रतिशत ही गोबर का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे यह पर्यावरण और हमारे लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस मशीन को लेकर कुछ चैलेंज झेलने पड़े थे पर उनके फीडबैक के बाद हमने मशीनों में बदलाव करके अभ्यास के तरीकों को काफी सामान्य कर दिया है, जिससे इसे कोई भी हैंडल कर सकता है। हमारे साथ ट्रांसपोर्ट कंपनी जुड़ी हुई है जो आप तक हमारे प्रोडक्ट को बेहद कम बजट में पहुंचाने में मदद कर रही है।

दर्शील ग्राम्य संदेश का बताते हुए कहते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण भारत के लिए इको-इनोवेशन करना है। जो कम लागत के हों और उनकी दैनिक ज़िंदगी का हिस्सा बनकर, उनके लिए एक रोज़गार का साधन जुटाने में मददगार हों। कोई भी ग्राम पंचायत उनसे ये मशीनें लेकर अपने गाँव में इनस्टॉल कर सकती है। इससे गाँव में कचरा-प्रबंधन भी होगा और गाँव के लोगों के लिए ईंधन के साथ-साथ अतिरिक्त आय भी बनेगी।

रिपोर्ट – अमित सिंह पालीवाल

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