बारिश एक खूबसूरत एहसास….

“बारिश” बेहद खूबसूरत लब्ज़ और एहसास है शायरों ,प्रेमियों और कवियों के लिए जो हुस्न,इश्क़,बारिश सभी को मिलाकर बेहद खूबसूरत अल्फ़ाज़ में बदलकर अपनी कल्पना को रचना रच देते, कभी तो मिलन का सुखद अनुभव औऱ कभी तो विरह का दर्द ….जिसमें आसमान को भी अपने दर्द में आँसू भाता हुआ बता देते हैं। बारिश की छम छम बूंदों के नर्तन की ध्वनि मन को मंत्रमुग्ध कर देती है। हर आयु वर्ग का व्यक्ति बारिश के लिए अलग अलग सम्वेदनाएं रखता है। बच्चों के लिए बारिश कागज़ की नाव बनाने का अवसर लाती है तो युवाओं के लिए बारिश के मायने कुछ अपने प्रेमी प्रेयसी के विषय को लेकर कल्पनाओं के समुंदर में डूबने उतराने के होते हैं। कल्पना तो मिलन या विरह दोनों संवेदनाओं की कर ली जा सकती है क्योंकि कल्पना के पंख पर उड़ान भरना बेहद सुखद अनुभूति कराता है चाहे वो किसी भी उम्र का व्यक्ति हो सभी में एक रोमांचक अनुभव का नवीन एहसास की उत्पत्ति करवा देता है ये बारिश का पल…..
बारिश की एक बूंद के लिए तड़पती इस धरती की व्याकुलता की कल्पना यदि कोई कर सकती है तो वह है स्वयं धरा वसुधा….

सूरज की तपती गर्मी से वसुधा का सारा लावण्य सूखकर बिखरने लग जाता है कण कण रेत के रूप में…. और एक बार बिखरने लगता है उसका स्वयं का अस्तित्व…..!कण कण बिखरती धरती का दर्द कितना गहरा होगा जो बिखरी जा रही है अपने अस्तित्व को समेटने में बचाने में एक असहाय युवती की तरह…उसकी यही चाहत होगी कि काश कोई आ जाए और उसे टूटने बिखरने से बचा ले और उसे समेट ले ,उसे स्वयं के अस्तित्व में जोड़ ले। दोनों एक हो जाएं जन्म जन्मांतर के बिछड़े प्रेमियों की तरह जिन्हें कोई अलग न कर सके दूध और पानी की तरह ……

वसुधा के सुलगते तन मन की प्यास बुझाने के लिए जब चन्द बून्दें गिरती है ऊपर से, तो वे अपना सम्पूर्ण अस्तित्व बिखेर कर समाहित हो जाती हैं वसुधा के समस्त कण कण में ….बून्दें बरसती जाती हैं अनवरत, अपनी धरा को बेहद खूबसूरत बनाने के प्रयास में, प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा से वसुधा को तृप्त करती हुई अनगिनत बार बारम्बार….सराबोर कर ती जाती है वसुधा के समस्त दृश्य अस्तित्व को लेकिन ये क्या….बूंदों का प्रेम तो वसुधा समाहित किये जा रही होती है अपने हृदय की गहराइयों तक ….उन दोनों के समर्पण के बाद होता है एक नवीन उतपत्ति का नवीन सृजन…वसुधा के हृदय की विरह की अग्नि में जलकर प्रेम की चन्द बूंदों की बारिश से होता है किसी बीज में अंकुर का प्रस्फुटन…. प्रेम का प्रतीक दोनों का ये प्यारा सा नन्हा सा कोमल पौधा..
जब प्रकृति का प्रेम इतना गहरा है तो हमें भी इस गहराई को डूबकर महसूस करना ही होगा। वाकई बारिश बहुत खूबसूरत होती है प्रकृति, मानव ,पेड़ ,पौधों ,पशु आदि सभी के लिए ….

मिलन -विरह, विरह-मिलन का कुछ यूं अर्थ है कि…. बूंदे तो पहले से ही समाहित थीं वसुधा की गोद में अपना अस्तित्व लिए हुए लेकिन वक्त की धूप ने विरह के लिए विवश किया वसुधा के …वाष्प बनकर उड़कर जाना पड़ा अपनी वसुधा से बेहद दूर बादलों के पास….लेकिन क्या विरह में तड़के बादल भी गरज चमक कर विरह गीत गाने लगे। फिर दोनों के मिलन की घड़ी भी आई बूंदे खूब बरसी अपने प्रेम का सागर लिए धरा पर बिछड़े प्रेमियों की तरह ….

एक बार फिर जीत हुई दोनों की भले हमेशा के लिए नहीं पर कुछ पल के लिए तो सही और एक नया अंकुर ,नवीन जीवन की उत्पत्ति और सृजन के लिए….. प्रकृति के परिवर्तनशील नियम बोध कराकर प्रस्तुत करते रहेंगे विरह मिलन ,मिलन विरह का हमेशा से चलता आ रहा निरन्तर अनवरत अबाध क्रम……
सभी बारिश प्रेमियों को समर्पित…

श्वेता श्रीवास्तव (वसुधा)

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