बुढ़िया दादी की चाय

मैं हर दिन सुबह जब स्कूल जाती थी तो लगभग 350 मीटर राप्ती का पुल पार करके जब दूसरे छोर पर पहुँचती तो उधर ही बैकुंठ धाम बना हुआ है और वहीं पर एक छोटी सी झोपड़ी थी जिसमें चाय की दुकान थी । चाय की भट्टी साफ करके उस टूटी झोपड़ी में प्रतिदिन एक बूढ़ी विधवा औरत को अपने कांपते हाथों से उसमें कोयला डालकर जलाने के प्रयास में हर दिन वो बूढ़ी औरत हमे दिख जाया करती थी। मेरे मन में भी यही सवाल उठता रहता था कि आखिर इस बूढ़ी औरत ने यहां मरघट पर दुकान क्यों खोली।

वहीं पर लकड़ियों के ठेकेदार भी कभी कभी दिखाई देते थे। जिस दिन कोई अंत्येष्टि होनी होती थी दाह संस्कार के लिए उनकी लकड़ियां बिकती थी अन्यथा बूढ़ी औरत तो रोज ही रहा करती थी लोगों को बहुत ही आग्रह से अपने हाथ से बनी चाय पीने को कहती थी और लोग पी भी लेते थे लेकिन वो कभी किसी से उसकी कीमत नहीं लेती थी ये क्रम कई सालों से देखती आ रही थी मैं….

एक दिन हमसे रहा नहीं गया जैसा कि महिलाओं को बातूनी होने का सौभाग्य मिला है न समाज से उसी के तहत हमने रुककर उनसे पूछ ही लिया कि दादी आप यहां मरघट पर दुकान क्यों लगाती हो, दादी ने बताया कि उनकी दुकान यहां क्यों लगती है अतीत में जैसे खो गयीं वो बताते हुए कि आज से 25 साल पहले हमारा बेटा अपने बचपन के साथियों के साथ खेलते हुए नदी के पानी में फिसल गया था। साथी बच्चे डर कर भाग गए और उसमें से एक लड़के ने मेरे घर जाके बताया कि आपका बेटा नदी में नहा ने गया है और फिर वो स्नान उसके जीवन का अंतिम स्नान साबित हुआ। आज तक वो वापस नहीं आया और देखो उसके कपड़े भी लिए बैठी इंतज़ार कर रही हूं। उस समय नदी बहुत बढ़ी हुई थी बाढ़ का पानी इर्दगिर्द के खेतों में भी घुस गया था। मेरे मालिक खेत में रोपाई कर के आये थे और मुझसे चाय बनाकर पिलाने के लिए कह ही रहे थे कि पड़ोसी के लड़के ने मेरे बेटे को पानी में डूबने की बात कही तो ऐसा सुनकर वह आनन फानन भागे मैं पीछे चीखती रही कि रुको ,हम भी चलते हैं लेकिन वो बहुत तेज से चलकर घाट तक आ गए मैं पीछे पीछे उनको नदी में न जाने के लिए रोकती हुई भागी आ रही थी क्योंकि मुझे पता था कि उनको तैरना नहीं आता है। वो बच्चे को बचाने के लिए जरूर ही कूद जाएंगे शायद वो हमसे ज्यादा प्यार करते थे बेटे को इसलिए… वो बच्चा मेरा अपना जन्म दिया हुआ नहीं था।

जानती हो एक पागल औरत घूमती रहती थी सालों पहले पूर्णतया विच्छिप्त किसी ने अपनी वासना की पूर्ति के लिए उसे साधन बना डाला और वो गर्भवती हुई और उसका प्रसव हम लोग ने मिलकर करवाया सरकारी अस्पताल में लेकिन दुर्भाग्य से प्रसव उपरांत उसकी मृत्यु हो गई और हम लोगों ने उसका अंतिम संस्कार किया लेकिन बच्चे को रखने के लिए कोई भी आगे नहीं आया तो मेरे मालिक उसे उठाकर लाये और मेरी सुनी गोद को भर दिया हमको कभी मां बनने का सौभाग्य तो नहीं मिला था लेकिन मां कहलाये जाने का सौभाग्य जरूर मिल गया था हम तीनों अपनी गरीबी में भी खुशहाल जीवन जी रहे थे।

लेकिन सुख जो भाग्य में नहीं होता इंसान के,उसे कहां तक भाग्य और होनी से छुपाकर जिया जा सकता है भाग्य से ऊपर कोई हो पाया है जो मैं हो पाती। आज भी मेरे मालिक मेरे बेटे को लेकर वापस नहीं आये कहकर गए थे कि अभी वापस आकर साथ में चाय पियेंगे। तभी से मैं रोज चाय बनाकर उनका इंतजार करती हूं लेकिन अभी तक नहीं आए बरसों बीत गए। जब भी अंत्येष्टि के लिए लोगों की भीड़ जुटी होती है मैं चाय बनाकर पिला देती हूं सबको …मुझे बहुत अच्छा लगता है बड़ी सन्तुष्टि मिलती है हर उस इंसान को देखकर जो मेरी चाय पी रहा होता है मुझे उसमें अपने मालिक का चेहरा नज़र आता है।

हमने भी कहा कि दादी आपके मालिक इतने सालों से आपकी चाय पीने नहीं आये और शायद अब आएंगे भी नहीं। आप बुजुर्ग हो गयी हैं घर पर आराम किया कीजिए यहां की सर्दी गर्मी बरसात ठंडी हवा क्यों झेल रही हैं आप ..? आपकी झोपड़ी भी बहुत पुरानी हो गई है कहीं गिर न जाये आप पर ..आप अब उनका इंतजार मत करो लेकिन वो तो अपने आगे सुन ही नहीं रही थीं शायद तभी तो लोग उन्हें पागल बुढ़िया कहते थे लेकिन उनसे मिलकर मुझे उनमें पागलपन जैसा कुछ नहीं मिला …

उनके अन्दर मिला तो बस अपने मालिक के प्रति अथाह प्रेम और आंखों में इंतज़ार की प्यास। वो बोली मैं पतिव्रता स्त्री हूँ उनकी आज्ञा का पालन कर रही हूं वो लौटकर आने का वायदा कर के गए हैं मैं अपना वायदा नहीं तोड़ सकती हूं चाहे वो आएं या न आएं मैं तो उनके लिए रोज चाय बनाऊंगी। मैं भी हंसकर बोली अगर वो नहीं आते हैं तो आप कब तक इंतजार करोगी उनका। वो भी हंसकर बोली मेरा उनके साथ बैठकर चाय पीने जाने के लिए ऊपर जाने के सफर के पूरा होने तक। आज फिर मैं सुबह स्कूल गयी सब कुछ ठीक ठाक दिख रहा था क्योंकि अनायास हमारी दृष्टि उस झोपड़ी पर जाने से हम खुद को कभी रोक ही नहीं पाते थे। ये तो हमारे शरीर की अनैच्छिक क्रिया में शामिल हो गया था प्रतिदिन की स्कूल की छुट्टी के बाद जब घर के लिए हम ऑटो से वापस जा रहे थे तो झोपड़ी के पास कुछ लोगों की भीड़ दिखाई दी। हम ने ऑटो वाले से रुकने को कहा और उसका किराया देकर उतर गई। नजदीक गई तो देखा कि आज दादी का इंतजार खत्म हुआ और दादी तो पहुंच गई अपने मालिक के पास साथ बैठकर चाय पीने।

वाह दादी आपने अपना वादा निभाया और क्या बखूबी निभाया, लगता है आज आप थक गईं बरसों इंतज़ार करते करते और खुद ही चली गईं मालिक के साथ बैठकर चाय पीने। मुझसे रहा नहीं गया मैं ने जाकर उनकी चाय की केतली को हिलाया तो उसमें चाय बनी हुई रखी थी लेकिन भट्ठी ,केतली और चाय तीनों ही ठंढी पड़ चुकी थी बिल्कुल दादी के ठंडे शरीर की तरह।

श्वेता श्रीवास्तव

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